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प्राचीन भारतीय और पुरातत्व इतिहास >> बीए सेमेस्टर-5 पेपर-2 प्राचीन भारतीय इतिहास

बीए सेमेस्टर-5 पेपर-2 प्राचीन भारतीय इतिहास

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2794
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-2 प्राचीन भारतीय इतिहास - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- भारत में नवपाषाण कालीन संस्कृति के विस्तार का वर्णन कीजिये।

अथवा
नवपाषाण संस्कृति की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिये।

सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न
1. नवपाषाण काल से आप क्या समझते हैं?
2. नवपाषाण कालीन संस्कृति के प्रमुख उपकरणों पर टिप्पणी लिखिये।
3. नवपाषाणिक संस्कृति की विशेषताओं का उल्लेख कीजिये।

उत्तर -

नवपाषाण काल

विश्व के अन्य भागों में नवपाषाण काल का प्रारम्भ ई.पू. 9000 में हुआ किन्तु भारत में नवपाषाण कालीन सभ्यता का प्रारम्भ ईसा पूर्व चार हजार के लगभग हुआ। भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनतम नवपाषाणिक बस्ती मेहरगढ़ (पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान प्रान्त में स्थित ) है जिसकी तिथि ईसा पूर्व 7000 मानी जाती है। ई.पू. 5000 के पूर्व यहाँ के लोग मृद्भाण्ड का प्रयोग करना नहीं जानते थे। उत्खनन में यहाँ से कच्चे मकान पत्थर के कटोरे, सान-पत्थर (grinding stone) तथा पालतू जानवरों की अस्थियाँ मिलती हैं। मेहरगढ़ का दूसरा स्तर ताम्रपाषाण काल से सम्बन्धित है। इस काल के लोग ताँबे के प्रयोग से परिचित थे। वे मिट्टी के बर्तन बनाते थे। मध्य भारत के साथ-साथ ईरान तथा अफगानिस्तान से उनका सम्पर्क था। वे गेहूँ, जौ तथा कपास की खेती करते थे तथा अपने मकान कच्ची ईटों एवं घास-फूस की सहायता से बनाते थे। उनका जीवन अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक उन्नत था।

भारत में नवपाषाण कालीन संस्कृति के जो अवशेष मिले हैं उनके आधार पर इसे छः भागों में विभाजित किया गया है - उत्तरी भारत, विन्ध्य-भारत, दक्षिण भारत, मध्य गंगा घाटी, मध्य-पूर्वी क्षेत्र तथा पूर्वोत्तर भारत। इन क्षेत्रों से अनेक नवपाषाणिक पुरास्थल प्रकाश में आये हैं। इस काल की प्रमुख विशेषता कृषि एवं पशुपालन का प्रारम्भ एवं पॉलिशदार पाषाण उपकरणों (विशेषकर कुल्हाड़ियों) का निर्माण है। मानव सभ्यता के इतिहास में कृषि के प्रारम्भ को एक क्रान्ति के रूप में देखा गया है। विल डूरेन्ट के शब्दों में समस्त मानव इतिहास एक प्रकार से दो क्रान्तियों पर आधारित है। नवपाषाण कालीन आखेट में कृषि में संचरण तथा आधुनिक कृषि से उद्योग में संचरण।

उत्तर भारत की नवपाषाणिक संस्कृति के अर्न्तगत कश्मीर प्रान्त के पुरास्थलों का उल्लेख किया जा सकता है। इनमें वुर्जहोम तथा गुफकराल विशेष महत्व के हैं। वुर्जहोम नामक पुरास्थल की खोज 1953 ई. में डी. टेरा तथा पीटरसन ने की थी। 1960-64 ई. के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से इस स्थान की खुदाई करवायी गयी। गुफकराल नामक स्थान की खुदाई 1981 ई. में एक के. शर्मा ने करवायी थी। यहाँ के उपकरणों में ट्रैप पत्थर पर बनी हुई कुल्हाड़ी, वसुली, खुरपी, छेनी, कुदाल, गदाशीर्ष, बेधक आदि हैं। पत्थर के अतिरिक्त हड्डी से बने हुये उपकरण भी यहाँ से मिलते हैं। इनमें पालिशदार वेधकों की संख्या अधिक है। भेड़-बकरी आदि जानवरों की हड्डियाँ तथा मिट्टी के बर्तन भी खुदाई में प्राप्त होते हैं। जौ, गेहूँ, मटर, मसूर आदि अनाजों के दाने मिलते हैं। वुर्जहोम की खुदाई से गड्ढे वाले घरों में अवशेष मिले है। शवाधान के जो उदाहरण मिलते हैं उनसे पता चलता है कि मनुष्य के साथ-साथ पालतू कुत्ते को भी दफनाने की प्रथा प्रचलित थी। इस प्रकार की प्रथा नवपाषाण काल में भारत में कही और प्रचलित नहीं थी।

गुफकराल के अन्य उपकरणों के साथ-साथ सिलबट्टे तथा हड्डी की बनी रुइयां भी मिलती हैं। इनसे सूचित होता है अनाज पीसने तथा वस्त्र सीने की विधियाँ भी उस काल में प्रचलित थीं। यहाँ से प्राप्त बर्तनों में घड़े कटोरे, थाली, तश्तरी आदि का उल्लेख किया जा सकता है। इसका निर्माण चाक तथा हाथ दोनों से किया गया है।

विन्ध्य क्षेत्र के प्रमुख नवपाषाण कालीन पुरास्थल इलाहाबाद जिले में वेलन सरिता के तट पर स्थित कोलडिहवा, महगड़ा तथा पंचोह हैं। यहाँ विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग द्वारा खुदाइयाँ करवायी गयी हैं। कोलडिहवा से नवपाषाण काल के साथ-साथ ताम्र तथा लौह कालीन संस्कृति के अवशेष भी मिलते हैं। महगड़ा तथा पंचोह से केवल नवपाषण कालीन अवशेष प्राप्त हुये हैं। यहां के उपकरणों में गोल समन्तान्त वाली पत्थर की कुल्हाड़ियों की संख्या ही अधिक है। अन्य उपकरण हथौड़े, छेनी, वसुली आदि हैं। स्तम्भ गाड़ने के गड्ढे मिले हैं जिनसे लगता है इस काल के लोग लकड़ी के खम्भों को जमीन में गाड़कर अपने रहने के लिये गोलाकार झोपड़िया बनाते थे। हाथ से बनाये गये विभिन्न आकार-प्रकार के मिट्टी के बर्तन मिलते हैं। यहाँ का एक विशिष्ट बर्तन रस्सी छाप है। इसकी बाहरी सतह पर रस्सी की छाप लगायी गई है। इसके अलावा खुरदुरे तथा चमकीले बर्तन भी मिले हैं। बर्तनों में कटोरे, तश्तरी घड़े आदि हैं। कुछ बर्तनों के ऊपर अलंकरण भी मिलता है। पशुओं में भेड़-बकरी, सुअर, हिरण की हड्डियां मिलती हैं। इससे स्पष्ट है कि इन जानवरों को पाला अथवा शिकार किया जाता था। कोलडिहवा के उत्खनन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि यहाँ से धान की खेती किये जाने का प्राचीनतम प्रमाण (ई.पू. 7000-6000) प्राप्त होता है। मिट्टी के बर्तनों की ठीकरों पर धान के दाने तथा भूसी एवं पुवाल के अवशेष चिपके हुये मिले हैं। इनसे सूचित होता है कि व्यापक रूप से धान की खेती की जाती थी। अनाज रखने के लिये उपयोगी घड़े तथा मटके भी कोलडिहवा एवं महगड़ा से मिलते हैं।

मध्य गंगा घाटी का सबसे महत्वपूर्ण नवपाषाण कालीन पुरास्थल चिरान्ड (बिहार के छपरा जिले में स्थित ) है। यहाँ उत्खनन के फलस्वरूप ताम्रपाषाण युग के साथ-साथ नवपाषाण युगीन संस्कृति के अवशेष भी मिलते हैं। यहाँ के उपकरणों में पालिशदार पत्थर की कुल्हाड़ी, सिलबट्टे हथौड़े तथा हड्डी और सींग के बने हुए छेनी, बरमा, बाण, कुदाल, सुई, चूड़ी आदि का उल्लेख किया जा सकता है। घड़े, कटोरी, टोटी वाले बर्तन, तसले आदि मृद्भाण्ड यहाँ से प्राप्त हुये हैं। ज्ञात होता है कि यहाँ के लोग अपने निवास के लिये बांस- वल्ली की झोपड़ियाँ बनाते थे तथा धान, मसूर, मूंग, गेहूँ, जौ आदि की खेती करना जानते थे। गाय-बैल, हाथी, बारहसिंहा, हिरण, गैडा आदि पशुओं से उनका परिचय था। कुछ हड्डियां भी प्राप्त होती हैं। बिहार के सिंहभूमि जिले में स्थित बरूडीह तथा उड़ीसा के मयूरभंज जिले में स्थित कुचाई भी नवपाषाण युगीन पुरास्थल है जहाँ से पालिशदार प्रस्तर कुल्हाड़ियाँ प्राप्त की गई है। कुदाल, छेनी, वसुली, आदि भी पाये गये हैं। वरुडीह से सलेटी तथा काले रंग के मृद्भाण्ड भी प्रकाश में आये हैं। असम की पहाड़ियों तथा मेघालय की गारो पहाड़ियों से भी नवपाषाण युगीन प्रस्तर उपकरण प्राप्त किये गये हैं। इनमें कुल्हाड़ी, हथौड़े, सिल-लोहढ़े मूसल आदि प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं। हाथ तथा चाक पर तैयार किये गये मिट्टी के बर्तनो के भी टुकड़े मिलते हैं।

विन्ध्य तथा गंगा घाटी की नवपाषाणिक संस्कृतियों में कुछ विषमतायें दिखाई देती हैं जो भौगोलिक परिस्थितियों का परिणाम हैं। विन्ध्य क्षेत्र मंि शैलाश्रय पहाड़ आदि थे जबकि गंगा घाटी में समतल मैदान थे। ये दलदल झीलों में परिवर्तित हो गये थे। अतः गंगा घाटी में मानव ने घास-फूस के घर बनाये, कृषि करना प्रारम्भ किया तथा पत्थर के साथ-साथ हड्डी और सींग के उपकरण, मिट्टी के बर्तन आदि बनाये। गंगा घाटी में पाषाणोपकरण छोटे-छोटे हैं। विद्वानों का विचार है कि वर्षा के बाद लोग गंगा घाटी में आते थे तथा वर्षा के दिनों में विन्ध्य के शैलाश्रयों में लौट जाते थे। इसे ऋतुजन्य प्रवजन की संज्ञा दी गई है। विन्ध्य क्षेत्र के शैलाश्रयों में चित्रकारियां मिलती हैं जो गंगा घाटी में नहीं है। गंगा घाटी के जीवन में एक अनुक्रम दिखाई देता है। यहाँ पाषाण काल के पश्चात् ताम्रपाषाण फिर लौह काल विकसित होता दिखाई देता है। द्वितीय नगरीय क्रान्ति यहाँ मिलती है। निश्चित आवास, चिकनी मिट्टी के बर्तन, पाषाण के साथ-साथ हड्डी तथा हाथीदांत के उपकरण भी मिलते हैं जिनका विन्ध्य क्षेत्र में आभाव अथवा अत्यल्पता है। विस्तृत पैमाने में खेती तथा पशुपालन के साक्ष्य यहाँ मिलते हैं। विन्ध्य क्षेत्र कि मिट्टी बलुई तथा गंगा घाटी की जलोढ़ है जिसमें खेती अच्छी होती थी। विन्ध्य क्षेत्र में विशालकाय पशु मिलते हैं। इसके विपरीत गंगा घाटी में लघुकाय पालतू पशुओं की संख्या अधिक है। विन्ध्य क्षेत्र से गंगा घाटी में आवागमन मुख्यतः सहसाराम की पहाड़ियों से होता था।

उत्तरी भारत के समान दक्षिणी भारत के कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु से भी नवपाषाण काल के कई पुरास्थल प्रकाश में आये हैं जहाँ की खुदाइयों से इस काल के अनेक उपकरण, मृद्भाण्ड आदि प्राप्त किये गये हैं। कर्नाटक में स्थित प्रमुख पुरास्थल मास्की, ब्रह्मगिरी, संगनकल्लू हल्लूर, कोडेकल, टी. नरसीपुर, पिकलोहल, तेक्कलकोट हैं। आन्ध्र प्रदेश के पुरास्थल नागार्जुनीकोंड, उतनूर, फलवाय एवं संगरपल्ली हैं। पैय्यमपल्ली तमिलनाडु का प्रमुख पुरास्थल है। ये सभी कृष्णा तथा कावेरी नदियों की घाटियों में बसे हुये हैं। इन स्थानों में पालिशदार प्रस्तर कुल्हाड़ियां, सलेटी या काले रंग के मिट्टी के बर्तन तथा हड्डी से बने हुये कुछ उपकरण प्राप्त होते हैं। इस काल के निवासी कृषि तथा पशुपालन से परिपूर्ण परिचित थे। मिट्टी तथा सरकण्डे की सहायता से वे अपने निवास के लिये घडे तथा गोलाकार अथवा चौकोर घर बनाते थे। हाथ तथा चाक दोनों से वे बर्तन तैयार करते थे। कुछ बर्तनों पर चित्रकारी भी की जाती थी। खुदाई में घड़े, तश्तरी, कटोरे आदि मिले हैं। कथली, रांगी, चना, मूंग आदि अनाजों का उत्पादन किया जाता था। गाय, बैल, भेड़, बकरी, भैंस, सुअर, उनके प्रमुख पालतू पशु थे। दक्षिण भारत में नवपाषाण युगीन सभ्यता की संभावित तिथि ईसा पूर्व 2500 से 1000 के लगभग निर्धारित की जाती है।

नवपाषाण कालीन संस्कृति अपने पूर्वगामी संस्कृतियों की अपेक्षा अधिक विकसित थी। इस काल का मानव न केवल खाद्य पदार्थों का उपभोक्ता ही था वरन् वह उनका उत्पादक भी बना। वह कृषि - कर्म से पूर्णतया परिचित हो चुका था। कृषिकर्म के साथ-साथ पशुओं को भी मनुष्य ने पालना प्रारम्भ कर दिया। गाय, बैल, भैंस, कुत्ता, घोड़ा, भेड़, बकरी आदि जानवरों से उनका परिचय बढ़ गया। मनुष्य ने अपने औजारों तथा हथियारों पर पालिश करना प्रारम्भ कर दिया। पालिशदार पत्थर की कुल्हाड़ियां देश के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या में मिलती हैं।

इस काल के मनुष्य का जीवन खानाबदोश अथवा घुमक्कड़ न रहा। उन्होंने एक निश्चित स्थान पर अपने घर बनाये तथा रहना प्रारम्भ कर दिया। कर्नाटक प्रान्त के ब्रह्मगिरी तथा संगनकल्लू ( वेलारी) से प्राप्त नवपाषाण युगीन अवशेषों से पता चलता है कि वर्षों तक मनुष्य एक ही स्थान पर निवास करता था। इस काल के मनुष्य मिट्टी के बर्तन बनाते थे तथा अपने मृतकों को समाधियों में गाड़ते थे। अग्नि के प्रयोग से परिचित होने के कारण मनुष्य का जीवन अधिक सुरक्षित हो गया था। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि इस युग के मनुष्य जानवरों की खालों को सीकर वस्त्र भी बनाना जानते थे।

उत्तर पाषाणकालीन मानव ने चित्रकला के क्षेत्र में भी रुचि लेना प्रारम्भ कर दिया था। मध्य भारत की पर्वत कन्दराओं में कुछ चित्रकारियाँ प्राप्त हुई हैं जो सम्भवतः इसी काल की हैं। ये चित्र शिकार से सम्बन्धित हैं। इस काल के मनुष्य अपने बर्तनों को भी रगते थे तथा उन पर चित्र बनाते थे।

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- पुरातत्व क्या है? इसकी विषय-वस्तु का निरूपण कीजिए।
  2. प्रश्न- पुरातत्व का मानविकी तथा अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
  3. प्रश्न- पुरातत्व विज्ञान के स्वरूप या प्रकृति पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  4. प्रश्न- 'पुरातत्व के अभाव में इतिहास अपंग है। इस कथन को समझाइए।
  5. प्रश्न- इतिहास का पुरातत्व शस्त्र के साथ सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
  6. प्रश्न- भारत में पुरातत्व पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
  7. प्रश्न- पुरातत्व सामग्री के क्षेत्रों का विश्लेषण अध्ययन कीजिये।
  8. प्रश्न- भारत के पुरातत्व के ह्रास होने के क्या कारण हैं?
  9. प्रश्न- प्राचीन इतिहास की संरचना में पुरातात्विक स्रोतों के महत्व का मूल्यांकन कीजिए।
  10. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास की संरचना में पुरातत्व का महत्व बताइए।
  11. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में अभिलेखों का क्या महत्व है?
  12. प्रश्न- स्तम्भ लेख के विषय में आप क्या जानते हैं?
  13. प्रश्न- स्मारकों से प्राचीन भारतीय इतिहास की क्या जानकारी प्रात होती है?
  14. प्रश्न- पुरातत्व के उद्देश्यों से अवगत कराइये।
  15. प्रश्न- पुरातत्व के विकास के विषय में बताइये।
  16. प्रश्न- पुरातात्विक विज्ञान के विषय में बताइये।
  17. प्रश्न- ऑगस्टस पिट, विलियम फ्लिंडर्स पेट्री व सर मोर्टिमर व्हीलर के विषय में बताइये।
  18. प्रश्न- उत्खनन के विभिन्न सिद्धान्तों तथा प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
  19. प्रश्न- पुरातत्व में ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज उत्खननों के महत्व का मूल्यांकन कीजिए।
  20. प्रश्न- डेटिंग मुख्य रूप से उत्खनन के बाद की जाती है, क्यों। कारणों का उल्लेख कीजिए।
  21. प्रश्न- डेटिंग (Dating) क्या है? विस्तृत रूप से बताइये।
  22. प्रश्न- कार्बन-14 की सीमाओं को बताइये।
  23. प्रश्न- उत्खनन व विश्लेषण (पुरातत्व के अंग) के विषय में बताइये।
  24. प्रश्न- रिमोट सेंसिंग, Lidar लेजर अल्टीमीटर के विषय में बताइये।
  25. प्रश्न- लम्बवत् और क्षैतिज उत्खनन में पारस्परिक सम्बन्धों को निरूपित कीजिए।
  26. प्रश्न- क्षैतिज उत्खनन के लाभों एवं हानियों पर प्रकाश डालिए।
  27. प्रश्न- पुरापाषाण कालीन संस्कृति का विस्तृत वर्णन कीजिए।
  28. प्रश्न- निम्न पुरापाषाण कालीन संस्कृति का विस्तृत विवेचन कीजिए।
  29. प्रश्न- उत्तर पुरापाषाण कालीन संस्कृति के विकास का वर्णन कीजिए।
  30. प्रश्न- भारत की मध्यपाषाणिक संस्कृति पर एक वृहद लेख लिखिए।
  31. प्रश्न- मध्यपाषाण काल की संस्कृति का महत्व पूर्ववर्ती संस्कृतियों से अधिक है? विस्तृत विवेचन कीजिए।
  32. प्रश्न- भारत में नवपाषाण कालीन संस्कृति के विस्तार का वर्णन कीजिये।
  33. प्रश्न- भारतीय पाषाणिक संस्कृति को कितने कालों में विभाजित किया गया है?
  34. प्रश्न- पुरापाषाण काल पर एक लघु लेख लिखिए।
  35. प्रश्न- पुरापाषाण कालीन मृद्भाण्डों पर टिप्पणी लिखिए।
  36. प्रश्न- पूर्व पाषाण काल के विषय में एक लघु लेख लिखिये।
  37. प्रश्न- पुरापाषाण कालीन शवाशेष पद्धति पर टिप्पणी लिखिए।
  38. प्रश्न- मध्यपाषाण काल से आप क्या समझते हैं?
  39. प्रश्न- मध्यपाषाण कालीन संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।।
  40. प्रश्न- मध्यपाषाणकालीन संस्कृति का विस्तार या प्रसार क्षेत्र स्पष्ट कीजिए।
  41. प्रश्न- विन्ध्य क्षेत्र के मध्यपाषाणिक उपकरणों पर प्रकाश डालिए।
  42. प्रश्न- गंगा घाटी की मध्यपाषाण कालीन संस्कृति पर प्रकाश डालिए।
  43. प्रश्न- नवपाषाणिक संस्कृति पर टिप्पणी लिखिये।
  44. प्रश्न- विन्ध्य क्षेत्र की नवपाषाण कालीन संस्कृति पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
  45. प्रश्न- दक्षिण भारत की नवपाषाण कालीन संस्कृति के विषय में बताइए।
  46. प्रश्न- मध्य गंगा घाटी की नवपाषाण कालीन संस्कृति पर टिप्पणी लिखिए।
  47. प्रश्न- ताम्रपाषाणिक संस्कृति से आप क्या समझते हैं? भारत में इसके विस्तार का उल्लेख कीजिए।
  48. प्रश्न- जोर्वे-ताम्रपाषाणिक संस्कृति की विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
  49. प्रश्न- मालवा की ताम्रपाषाणिक संस्कृति का विस्तार से वर्णन कीजिए।
  50. प्रश्न- ताम्रपाषाणिक संस्कृति पर टिप्पणी लिखिए।
  51. प्रश्न- आहार संस्कृति का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
  52. प्रश्न- मालवा की ताम्रपाषाणिक संस्कृति पर प्रकाश डालिए।
  53. प्रश्न- जोर्वे संस्कृति की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
  54. प्रश्न- ताम्रपाषाणिक संस्कृति के औजार क्या थे?
  55. प्रश्न- ताम्रपाषाणिक संस्कृति के महत्व पर प्रकाश डालिए।
  56. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता / हड़प्पा सभ्यता के नामकरण और उसके भौगोलिक विस्तार की विवेचना कीजिए।
  57. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता की नगर योजना का विस्तृत वर्णन कीजिए।
  58. प्रश्न- हड़प्पा सभ्यता के नगरों के नगर- विन्यास पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
  59. प्रश्न- सिन्धु घाटी के लोगों की शारीरिक विशेषताओं का संक्षिप्त मूल्यांकन कीजिए।
  60. प्रश्न- पाषाण प्रौद्योगिकी पर टिप्पणी लिखिए।
  61. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता के सामाजिक संगठन पर टिप्पणी कीजिए।
  62. प्रश्न- सिंधु सभ्यता के कला और धर्म पर टिप्पणी कीजिए।
  63. प्रश्न- सिंधु सभ्यता के व्यापार का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
  64. प्रश्न- सिंधु सभ्यता की लिपि पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
  65. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता के पतन के कारणों पर प्रकाश डालिए।
  66. प्रश्न- लौह उत्पत्ति के सम्बन्ध में पुरैतिहासिक व ऐतिहासिक काल के विचारों से अवगत कराइये?
  67. प्रश्न- लोहे की उत्पत्ति (भारत में) के विषय में विभिन्न चर्चाओं से अवगत कराइये।
  68. प्रश्न- "ताम्र की अपेक्षा, लोहे की महत्ता उसकी कठोरता न होकर उसकी प्रचुरता में है" कथन को समझाइये।
  69. प्रश्न- महापाषाण संस्कृति के विषय में आप क्या जानते हैं? स्पष्ट कीजिए।
  70. प्रश्न- लौह युग की भारत में प्राचीनता से अवगत कराइये।
  71. प्रश्न- बलूचिस्तान में लौह की उत्पत्ति से सम्बन्धित मतों से अवगत कराइये?
  72. प्रश्न- भारत में लौह-प्रयोक्ता संस्कृति पर टिप्पणी लिखिए।
  73. प्रश्न- प्राचीन मृद्भाण्ड परम्परा से आप क्या समझते हैं? गैरिक मृद्भाण्ड (OCP) संस्कृति का विस्तृत विवेचन कीजिए।
  74. प्रश्न- चित्रित धूसर मृद्भाण्ड (PGW) के विषय में विस्तार से समझाइए।
  75. प्रश्न- उत्तरी काले चमकदार मृद्भाण्ड (NBPW) के विषय में संक्षेप में बताइए।
  76. प्रश्न- एन. बी. पी. मृद्भाण्ड संस्कृति का कालानुक्रम बताइए।
  77. प्रश्न- मालवा की मृद्भाण्ड परम्परा के विषय में बताइए।
  78. प्रश्न- पी. जी. डब्ल्यू. मृद्भाण्ड के विषय में एक लघु लेख लिखिये।
  79. प्रश्न- प्राचीन भारत में प्रयुक्त लिपियों के प्रकार तथा नाम बताइए।
  80. प्रश्न- मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि पर प्रकाश डालिए।
  81. प्रश्न- प्राचीन भारत की प्रमुख खरोष्ठी तथा ब्राह्मी लिपियों पर प्रकाश डालिए।
  82. प्रश्न- अक्षरों की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालिए।
  83. प्रश्न- अशोक के अभिलेख की लिपि बताइए।
  84. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास की संरचना में अभिलेखों के महत्व का उल्लेख कीजिए।
  85. प्रश्न- अभिलेख किसे कहते हैं? और प्रालेख से किस प्रकार भिन्न हैं?
  86. प्रश्न- प्राचीन भारतीय अभिलेखों से सामाजिक जीवन पर क्या प्रकाश पड़ता है?
  87. प्रश्न- अशोक के स्तम्भ लेखों के विषय में बताइये।
  88. प्रश्न- अशोक के रूमेन्देई स्तम्भ लेख का सार बताइए।
  89. प्रश्न- अभिलेख के प्रकार बताइए।
  90. प्रश्न- समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति के विषय में बताइए।
  91. प्रश्न- जूनागढ़ अभिलेख से किस राजा के विषय में जानकारी मिलती है उसके विषय में आप सूक्ष्म में बताइए।
  92. प्रश्न- मुद्रा बनाने की रीतियों का उल्लेख करते हुए उनकी वैज्ञानिकता को सिद्ध कीजिए।
  93. प्रश्न- भारत में मुद्रा की प्राचीनता पर प्रकाश डालिए।
  94. प्रश्न- प्राचीन भारत में मुद्रा निर्माण की साँचा विधि का वर्णन कीजिए।
  95. प्रश्न- मुद्रा निर्माण की ठप्पा विधि का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
  96. प्रश्न- आहत मुद्राओं (पंचमार्क सिक्कों) की मुख्य विशेषताओं एवं तिथिक्रम का वर्णन कीजिए।
  97. प्रश्न- मौर्यकालीन सिक्कों की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत कीजिए।
  98. प्रश्न- आहत मुद्राओं (पंचमार्क सिक्के) से आप क्या समझते हैं?
  99. प्रश्न- आहत सिक्कों के प्रकार बताइये।
  100. प्रश्न- पंचमार्क सिक्कों का महत्व बताइए।
  101. प्रश्न- कुषाणकालीन सिक्कों के इतिहास का विस्तृत विवेचन कीजिए।
  102. प्रश्न- भारतीय यूनानी सिक्कों की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
  103. प्रश्न- कुषाण कालीन सिक्कों के उद्भव एवं प्राचीनता को संक्षेप में बताइए।
  104. प्रश्न- गुप्तकालीन सिक्कों का परिचय दीजिए।
  105. प्रश्न- गुप्तकालीन ताम्र सिक्कों पर टिप्पणी लिखिए।
  106. प्रश्न- उत्तर गुप्तकालीन मुद्रा का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
  107. प्रश्न- समुद्रगुप्त के स्वर्ण सिक्कों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  108. प्रश्न- गुप्त सिक्कों की बनावट पर टिप्पणी लिखिए।
  109. प्रश्न- गुप्तकालीन सिक्कों का ऐतिहासिक महत्व बताइए।
  110. प्रश्न- इतिहास के अध्ययन हेतु अभिलेख अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। विवेचना कीजिए।
  111. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में सिक्कों के महत्व की विवेचना कीजिए।
  112. प्रश्न- प्राचीन सिक्कों से शासकों की धार्मिक अभिरुचियों का ज्ञान किस प्रकार प्राप्त होता है?
  113. प्रश्न- हड़प्पा की मुद्राओं के महत्व का मूल्यांकन कीजिए।
  114. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में अभिलेखों का क्या महत्व है?
  115. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत के रूप में सिक्कों का महत्व बताइए।

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